Kabhi Ehsaas Hi Nahi Hua Ki Dil Sheeshe Ka Bana Hai | Sher-o-Shayari

Kabhi Ehsaas Hi Nahi Hua Ki Dil Sheeshe Ka Bana Hai

By | Dec 11, 2013

हमें आदत थी पत्थर के मकानों में ठहरने की,
कभी एहसास ही नहीं हुआ कि दिल सीसे का बना है।

हमारी मोहब्बत का बस इतना सा पैगाम था ,
वक़्त -बे -वक़्त उसका मुझ पर ही इलज़ाम था।

ज़माना यूँ तो नाराज़ नहीं था मुझसे पहले कभी ,
एक तेरी मोहब्बत के खातिर आज सबके बैरी हो गए।

न जाने कौन सी दवा दे गया था वो हक़ीम ,
न ही वो पास आती है, न ही ये मर्ज़ दूर जाता है।

अब मेरे कलम कि दिवानगी रोके नहीं रूकती ,
इस मोहब्बत ने हमें भी शायर बना दिया।

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