Khwahish hai dil kee ki choom lu un adhron ko | Sher-o-Shayari

Khwahish hai dil kee ki choom lu un adhron ko

By | Dec 23, 2013

ख्वाहिश है दिल की
कि चूम लूँ उन अधरों को
मगर ये चाह सिमट के रह जाती है
जब उनकी सुर्ख लाली का सवाल आता है

इल्तजा है मेरी उनसे
कि उनकी जुल्फों से मैं खेलूं
मगर बड़ी गुस्ताख हैं जुल्फें
मेरे शाने पे बिखर जाती हैं

तमन्ना है दिल की
कि थाम लूँ में हाँथ उनका जोर से
मगर ये हसरत अधूरी रह जाती है
जब उनकी चूड़ियों का ख्याल आता है

एक हसीं ख्वाब है मेरा
कि मेरे आँगन में रुनझुन हो
हंसी हैं पाँव जानम के
कयामत रोज ढाते हैं

बेताबी है मेरे दिल की
तेरे घूँघट को खोलूं मैं
मगर हाय वो शर्मों हया का बादल
जो दिल में आग लगाता है

दीवानगी है मेरे दिल की
चली हैं नजरों का सितम सहने
मगर एक आह सी निकली
तेरी नजरों के मिलने से …

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