Kitna Barsega Saawan Is Baar Ghar Pe Mere | Sher-o-Shayari

Kitna Barsega Saawan Is Baar Ghar Pe Mere

By | Nov 19, 2013

तेरे अहसानों का बोझ है जो मे सह नही पाता

वरना सितम तो उठाये फिरता हु कब से तेरे

क्या हम तो खुद ही कैद हो गये चाहत मे तेरी

वरना आसमान बहुत थे आँखों के सामने मेरे

हम तेरे दिए दर्द ओ गम मे भी बसर कर लेगें

तू देख लेना केसे गुजरेगे फिर दिन रात तेरे

अच्छाई मे बुराइयाँ ढुढती है हमेशा से दुनिया

पर तेरी भी हिम्मत कहाँ है झेले ख्यालात मेरे

मेने तेरे लिए ही जंग लड़ी जमाने से अबतक

फिर भी क्यों मरे लिए ही पत्थर है हाथ मे तेरे

उन्ही की बस्ती मे अच्छा लगने लगा है मुझे

जो हरतरह हमेशा दुश्मन हुआ करते थे मेरे

बड़ी उम्मीद से उठी है आखें बदलो की तरफ

कितना बरसेगा सावन इस बार घर पे मेरे

अनीता मलिक

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